पापा मैंने लिखी कविता
पापा मैंने लिखी कविता
सुनो! सुनो! तुम मेरी कविता
मेरी कविता में नहीं है परियां
न इसमें कोई, बाग और बगिया
गुड्डे- गुड़िया खेल नहीं है
छुक-छुक भागती रेल नहीं है
ना पर्वत, ना नदी-समंदर
न ही कहीं कोई भालू-बंदर
इसमें रित्विक, सलमान, कटरीना
आमीर, अक्षय, साहिद,करीना
इसमें चाकलेट, पीज़ा, बर्गर,
पैटी, आइसक्रीम खाओ जमकर
इसमें स्कूल है, बस है, स्टैंड है
बस पढने में ही, पूरा दिन एंड है
पापा मैंने लिखी कविता
सुनो! सुनो! तुम मेरी कविता
Wednesday, October 12, 2011
Thursday, September 29, 2011
चिड़िया रानी
मित्रों! बालबाड़ी का प्रथम पुष्प प्रस्तुत है
अरुण मिश्र ,अध्यापक,अर्थशास्त्र में परास्नातक ,पठन-पाठन में
रूचि,यदा-कदा कविता-लेखन ! वामपंथी विचारधारा के प्रति आस्था रखते हैं
उनके ही शब्दों में"एक व्यक्ति से अधिक स्वयं को समूची मानव परंपरा मानता हूँ ! मेरा जन्म
प्रथम मानव के साथ हुआ ! बच्चे इसी मानव परंपरा की अगली कड़ी हैं ! वे
मेरा अगला और संशोधित संसकरण है ! मैं इनमें जिंदा रहूँगा ! पुनर्जन्म और
अमरता का मेरे समक्ष यही अर्थ है !"
चिड़िया रानी
आज किधर से सूरज निकला आज किधर की हवा चली ,
चिड़िया रानी कहाँ रहीं थीं बहुत दिनों के बाद मिलीं !
पहले तो घर के आँगन में खूब धमाल मचाती थीं ,
दाना चुगती,तिनके चुनती अपना नीड़ बनाती थीं !
फिर क्या हुआ अचानक तुमने मिलना-जुलना छोड़ दिया ,
हमसे रिश्ता तोड़ के बोलो किनसे रिश्ता जोड़ लिया !
चिड़िया बोली ,"बिटिया रानी ऐसी कोई बात नहीं ,
प्यार करूँ औ' निभा न पाऊँ ऐसी मेरी जात नहीं !
सारे पेड़ कट गए फिर बोलो कैसे रह पाती मैं ,
कैसे रैन-बसेरा करती किस पर नीड़ बनाती मैं !
दूर घने जंगल में रहने निकल गई मैं क्या करती,
आखिर कुछ तो जीने का जरिया करती या फिर मरती !
तुमसे बिछड़ कर दुःख मुझे भी हुआ बहुत पर जाने दो
सुना है तुमने अबके बरस सोंचा है पेड़ लगाने को ?
अरुण मिश्र
४७९,विजयलक्ष्मी नगर ,सीतापुर-२६१००१.
मो.९४१५६५६३९०
अरुण मिश्र ,अध्यापक,अर्थशास्त्र में परास्नातक ,पठन-पाठन में
रूचि,यदा-कदा कविता-लेखन ! वामपंथी विचारधारा के प्रति आस्था रखते हैं
उनके ही शब्दों में"एक व्यक्ति से अधिक स्वयं को समूची मानव परंपरा मानता हूँ ! मेरा जन्म
प्रथम मानव के साथ हुआ ! बच्चे इसी मानव परंपरा की अगली कड़ी हैं ! वे
मेरा अगला और संशोधित संसकरण है ! मैं इनमें जिंदा रहूँगा ! पुनर्जन्म और
अमरता का मेरे समक्ष यही अर्थ है !"
चिड़िया रानी
आज किधर से सूरज निकला आज किधर की हवा चली ,
चिड़िया रानी कहाँ रहीं थीं बहुत दिनों के बाद मिलीं !
पहले तो घर के आँगन में खूब धमाल मचाती थीं ,
दाना चुगती,तिनके चुनती अपना नीड़ बनाती थीं !
फिर क्या हुआ अचानक तुमने मिलना-जुलना छोड़ दिया ,
हमसे रिश्ता तोड़ के बोलो किनसे रिश्ता जोड़ लिया !
चिड़िया बोली ,"बिटिया रानी ऐसी कोई बात नहीं ,
प्यार करूँ औ' निभा न पाऊँ ऐसी मेरी जात नहीं !
सारे पेड़ कट गए फिर बोलो कैसे रह पाती मैं ,
कैसे रैन-बसेरा करती किस पर नीड़ बनाती मैं !
दूर घने जंगल में रहने निकल गई मैं क्या करती,
आखिर कुछ तो जीने का जरिया करती या फिर मरती !
तुमसे बिछड़ कर दुःख मुझे भी हुआ बहुत पर जाने दो
सुना है तुमने अबके बरस सोंचा है पेड़ लगाने को ?
अरुण मिश्र
४७९,विजयलक्ष्मी नगर ,सीतापुर-२६१००१.
मो.९४१५६५६३९०
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